Friday, 31 July 2020

बड़ा कब्रिस्तान, हिंदू श्मशान


मरकज़ के नाम पर न जाने कितना शोर मचाया गया, कितनी नफरत फैलाई गई। शक का कीड़ा तो हर किसी मन में पनपने लगा था।

अहमदाबाद की ट्रम्प यात्रा देश को कोरोना देकर गई, लेकिन इस बात को दबा दिया गया।

दाढ़ी वालों के नाम पर आग लगाने में तो वो लोग हमेशा ही आगे रहते हैं।

लेकिन जब कोविड ग्रस्त हिन्दू लाशों का अंतिम क्रियाकर्म करने की परिवार वालों की हिम्मत नहीं थी, तब मुंबई के प्रसिद्ध बड़े कब्रिस्तान से मुसलमान आगे आए। एक-दो नहीं, बल्कि 300 से ज़्यादा हिंदू लाशों का अंतिम संस्कार उन मुस्लिम कार्यकर्ताओं ने किया। बिल्कुल हिन्दू रीति रिवाज़ों से। गले में तुलसी की माला पहनकर। अर्थी सजाकर, चिता रचकर। छेद वाले मटके से पानी की धार बहाकर... प्रदक्षिणा लगाकर। इसके बाद महानगर पालिका की प्रोटोकॉल के अनुसार विद्युत शवदाह गृह में मुखाग्नि दिया। मंत्रोच्चार किया। मोबाइल पर Whatsapp Video Call पर उनके परिवार को अंतिम क्रियाकर्म दिखाया। अगर किसी ने विनती की तो अस्थि विसर्जन भी कर दिया। जिन्होंने मांगा, उनके घर अस्थि भी पहुंचाई। और इन सबके लिए उन्होंने एक भी पैसा नहीं लिया। उल्टे पंडित जी को दान दक्षिणा भी दिया। सुरक्षित अंतर रखकर पंडित जी निर्देश देते रहे और नमाजी टोपीधारी मुसलमान मंत्रोच्चारण करके अंतिम संस्कार करते रहे।

कूपर हॉस्पिटल से हिन्दू लाश लेकर टिपिकल मुसलमानी पहनावे में जब 6 लोग ओशिवरा श्मशान भूमि में पहली बार पहुंचे, तो श्मशान के कर्मचारी डर गए। पर उनके पास बाक़ायदा मृत्यु प्रमाण पत्र था। हॉस्पिटल का पत्र था और परिवार का वीडियो मैसेज भी था। श्मशान के कर्मचारी तैयार हो गए। पहले दिन उन मुसलमान कर्मचारियों को सब कुछ नया होने के कारण अड़चन ज़रूर आई, लेकिन सब पूछ-पूछ कर उन्होंने अंतिम संस्कार किया।

हिन्दुओं में भी, एक नहीं, अनेक मान्यताएं, प्रथाएं हैं। उन्होंने परिवार द्वारा बताई गई हर प्रथा हर संस्कार का पालन किया। एक परिवार में तो केवल एक बेटी थी। कोई भी रिश्तेदार आने को तैयार नहीं था। इक़बाल ममदानी उस लड़की को लेकर बाणगंगा गए। श्रीराम द्वारा वनवास के समय यहां आने की कथा प्रचलित है। उनके तीर से ही यहां गंगा अवतरित हुई थी, ऐसी दन्तकथा है। उस बाणगंगा पर इक़बाल भाई ने लड़की के पिता का विधिवत अस्थि विसर्जन किया।

एक महीने पहले ही उत्तर प्रदेश के कानपुर के पास एक गाँव में एक हिन्दू वृद्ध की मृत्यु हो गई। उनकी लाश को अपने कंधों पर उठा कर, हाथ में अग्नि का घड़ा लेकर और ‘राम नाम सत्य है’ का जाप करते हुए मुसलमानों ने उनकी अंतिम यात्रा निकाली। लॉकडाउन के कारण अंतिम संस्कार में उनका कोई भी रिश्तेदार नहीं पहुंच सकता था। गाँव में सभी मुसलमान थे, केवल एक घर हिन्दू का था। उस घर में सभी लोग शहर में नौकरी करते थे। बूढ़े आदमी की देखभाल मुसलमान पड़ोसी ही करते थे। लेकिन प्रश्न ये था कि अंतिम संस्कार कैसे किया जाए। रिश्तेदारों ने कह दिया था कि आप लोग ही उनका अंतिम संस्कार कर दीजिए। आख़िर मुस्लिम युवक इकट्ठा हुए और उनका अंतिम संस्कार किया। उस वीडियो में आपने राम नाम सत्य है की ध्वनि सुनी होगी। लेकिन मुंबई में 300 लाशों के अंतिम संस्कार में राम नाम सत्य है की वही ध्वनि सुनी जा सकती थी। क्योंकि पास होकर भी कोरोनाग्रस्त लाश को कौन छूने को कोई भी तैयार नहीं था।

जलगाँव के एक शिक्षक की कोरोना से मौत हो गयी। उनका अंतिम संस्कार करने, उनकी अर्थी को कंधा देने कोई नहीं आया। सब लोग दूर से देख रहे थे। उनके बेटे ने अपने पिता के शव को अकेले अपने कंधों पर उठाया। उसने सब अकेले कैसे किया होगा, ये वही जानता होगा।

लेकिन इक़बाल ममदानी और उनके सहयोगियों का साथ दिया बड़े कब्रिस्तान के चेयरमैन शोएब ख़तीब ने। कई लोगों के लिए तो उन्होंने कब्रिस्तान में जगह भी उपलब्ध कराई। हिंदुओं का अंतिम संस्कार करते समय अपना धर्म भ्रष्ट होगा, ऐसा विचार भी उनके मन में नहीं आया। उन्होंने न केवल हिंदुओं की लाशों का, बल्कि कुछ पारसियों और ईसाइयों की लाशों का भी उनके धार्मिक संस्कारों के अनुसार निस्तारण किया। पारसी भाइयों के रिवाज़ अलग हैं। ईसाई भाइयों के रिवाज़ अलग हैं। पर सारे संस्कार उनके धर्म के अनुसार ख़तीब और ममदानी की टीम ने निभाए।

इक़बाल ममदानी ने बताया, हम मुस्लिम लाशों को दफ़ना रहे थे। उन्हें विधिवत दफ़नाया जा रहा था। तभी हमारा ध्यान गया कि मुर्दाघर में कई लाशें पड़ी थीं। हमने डॉक्टर से पूछा। तो उन्होंने कहा, ये हिन्दुओं की लाशें हैं। कोई इन्हें ले जाने को तैयार नहीं है। महानगर पालिका के कर्मचारी भी अब कम पड़ रहे हैं। 

ममदानी ने उनसे पूछा, "अगर हम इनका अंतिम संस्कार करें तो चलेगा क्या?" हम इनका अंतिम संस्कार इनके रीति रिवाज़ के अनुसार ही करेंगे। डॉक्टर ने कहा, इससे बेहतर बात और क्या हो सकती है,  बस आवश्यक अनुमतियाँ ले लें, तब आप ये कार्य कर सकते हैं।

उन सभी अनुमतियों को प्राप्त करने के बाद, अप्रैल, मई, जून और अब जुलाई में चार महीनों से लगातार ये टीम काम कर रही है। इस टीम में दो सौ युवा हैं। लेकिन जिन सात लोगों ने इस कार्य की शुरुआत की थी, उनके नामों का उल्लेख तो मुझे ज़रूर करना चाहिए। बड़ा कब्रिस्तान के चेयरमैन शोहेब ख़तीब, वरिष्ठ पत्रकार इक़बाल ममदानी, उद्यमी शाबिर निर्बन, एडवोकेट इरफ़ान शेख़, उद्यमी सलीम पारेख, उद्यमी सोहेल शेख़, सामाजिक कार्यकर्ता रफ़ीक सुरतीया। आज भी ये लोग ये कार्य कर रहे हैं। शुरूआत में परेशानी हुई, Ambulance की, शववाहिनियों की। 

कोविड ग्रस्तों के रिश्तेदार ही नहीं आ रहे थे, तो उन्हें Ambulance कहाँ मिलेगा? ममदानी और ख़तीब ने तब एक तरीक़ा खोजा। उन्होंने बेकार और खराब पड़े Ambulance का पता लगाया। उन्हें ठीक कराया। अब वे लगातार काम कर रहे हैं। ख़तीब भाई, इक़बाल भाई और उनकी पूरी टीम इस काम के लिए एक भी रुपया नहीं लेते। सभी ख़र्च वे स्वयं उठाते हैं। कुछ परोपकारी लोगों ने उनकी मदद की है। लेकिन वे रिश्तेदारों से एक भी पैसे नहीं लेते हैं। इक़बाल भाई का कहना है कि लॉकडाऊन के कारण लोग पहले ही आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे में उनसे अंतिम संस्कार के पैसे कैसे मांगें? ऐसा इक़बाल भाई का सवाल था।

इक़बाल भाई, उनके सहयोगी और इस काम में शामिल 200 मुस्लिम युवा अपने परिवारों की परवाह किए बिना लगातार काम कर रहे हैं। इन लोगों को प्यार से गले लगाने की इच्छा आपकी भी हो रही होगी न।

देश में नफ़रत फैलाने वाले, हिंदू-मुस्लिम, हिंदू-मुस्लिम करनेवाले, व्हाट्सएप पर गंदी भाषा इस्तेमाल करनेवाले गोडसेवाले नथुरामों की कमी नहीं है। क्या वे कभी अपनी आंखों पर बंधी काली पट्टी हटाएंगे? क्या द्वेष और घृणा से भरे पित्त की उल्टी करके बाहर निकाल देंगे? क्या ममदानी, ख़तीब और उनके साथी से प्यार से गले मिलेंगे?  इस सवाल का जवाब हां होगा, ऐसी आशा है। आख़िर उम्मीद क्यों छोड़े?

(लेखक महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य, राष्ट्र सेवा दल के मॅनेजिंग ट्रस्टी और लोक भारती पक्ष के अध्यक्ष है।)

मूल मराठी से भावानुवाद : हरिगोविंद विश्वकर्मा

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मूल मराठी ब्लॉग 

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Thursday, 30 July 2020

बडा कब्रस्थान, हिंदू समशान


मरकजच्या नावाने किती बोंब मारली गेली. संशयाचं किटाळ तर आपल्या मनातही जमा झालं होतं. 

अहमदाबादची ट्रम्प यात्रा मागे कोरोना ठेवून गेली, पण ते झाकण्यात आलं. 

दाढीवाल्यांच्या नावाने शिमगा करण्यात तर ते सराईतच आहेत. 

पण कोविडग्रस्त हिंदू प्रेतांवर अंतिम संस्कार करायला कुटुंबातले धजत नव्हते, तेव्हा मुंबईतल्या प्रसिद्ध बडा कब्रस्थान मधले मुसलमान पुढे आले. एक नाही, दोन नाही 300 पेक्षा जास्त हिंदू प्रेतांवर त्या मुस्लिम कार्यकर्त्यांनी शेवटचे संस्कार केले. अगदी हिंदू पद्धतीने. गळ्यात तुळशीची माळ घालून. व्यवस्थित तिरडी बांधून. चिता रचून. छिद्र असलेल्या मडक्यातून पाण्याची धार वाहत, प्रदक्षिणा घालत. नंतर पालिकेच्या प्रोटोकॉल नुसार विद्युत वाहिनीवर. भडाग्नी दिला. मंत्राग्नी दिला. मोबाईल वरून Whatsapp Video Call लावत सगळे अंतिम संस्कार त्यांच्या कुटुंबियांना दाखवले. अगदी काहींनी विनंती केली तर अस्थी विसर्जनही केलं. ज्यांनी मागितल्या त्यांच्या घरी अस्थी पोचवल्या. त्यासाठी एक पैसाही आकारला नाही. उलट भटजीला दान दक्षिणा दिली. अंतर ठेवून भटजी सूचना देत होता. आणि नमाजी टोपीधारी मुसलमान हिंदू मंत्र बोलत शेवटचा अग्नी देत होते. 

कुपर हॉस्पिटल मधील पहिलं हिंदू प्रेत घेऊन टिपिकल मुसलमानी पेहरावातील ते सहा जण ओशिवऱ्याच्या स्मशातभूमीत पहिल्यांदा पोचले तेव्हा, स्मशानातले कर्मचारी घाबरले होते. पण त्यांच्याकडे बाकायदा मृत्यूचं सर्टिफिकेट होतं. हॉस्पिटलचं पत्र होतं आणि कुटुंबियांचा व्हिडीओ मेसेज होता. स्मशानभूमीतले कर्मचारी तयार झाले. पहिल्या दिवशी त्या मुस्लिम कार्यकर्त्यांची नवागतासारखी अडचण जरूर झाली. पण माहिती घेत त्यांनी तो अंतिम संस्कार पार पाडला. 

हिंदूंमध्ये सुद्धा एक प्रथा नाही, अनेक प्रथा आहेत. कुटुंबियांनी सांगितलं तसं प्रत्येक प्रथेचं पालन त्यांनी केलं. एका कुटुंबात तर मुलगीच होती. नातेवाईक कोणी यायला तयार नव्हते. इक्बाल ममदानी त्या मुलीला घेऊन बाणगंगेवर गेले. श्रीराम दंडकारण्यात असताना इथे येऊन गेल्याची कथा प्रचलित आहे. त्यांच्या बाणानेच इथे गंगा अवतरली अशी दंतकथा आहे. त्या बाणगंगेवर इक्बाल भाईंनी त्या मुलीच्या वडिलांचं अस्थी विसर्जन विधीवत केलं. 

महिन्यापूर्वी उत्तर प्रदेशात कानपूर जवळच्या एका गावात एक हिंदू म्हातारा गेला. तेव्हा त्याची प्रेत यात्रा खांद्यावर घेत आणि हातात अग्नीचं मडक घेत, राम नाम सत्य है चा जप करत मुसलमानांनी त्यांची अंत्ययात्रा काढली. कारण लॉकडाऊनमुळे त्यांचे कोणतेच नातेवाईक येऊ शकत नव्हते. गावात सगळे मुसलमान, एकच घर हिंदूंचं होतं. त्या घरातले सगळे दूर शहरात नोकरीला गेलेले. म्हाताऱ्याला शेजारचे मुसलमानच सांभाळत होते. पण अंतिम संस्कार कसा करायचा? हा प्रश्न होता. नातेवाईकांनी सांगितलं तुम्हीच करा. मुस्लिम तरुण जमले आणि त्यांनी पुढचे सोपस्कार पार पाडले. राम नाम सत्य है, असा त्यांचा ध्वनी त्या व्हिडीओत तुम्ही पाहिलाही असेल. पण राम नाम सत्य है, असा 300 प्रेतांच्या अंतिम संस्कारात तोच प्रतिध्वनी मुंबईत ऐकू येत होता. कारण जवळ असूनही कोरोनाग्रस्त प्रेताला हात कोण लावणार? 

जळगावला एक शिक्षक कोरोनामुळे गेले. त्यांचे अंतिम संस्कार करायला, खांदा द्यायला कुणीही आलं नाही. सगळे लांबून पाहत होते. त्यांच्या मुलाने आपल्या वडिलांचं प्रेत एकट्याने खांद्यावर नेलं. सरणावर कसं चढवलं असेल ते त्यालाच माहीत.

पण इक्बाल ममदानी आणि त्यांच्या सहकाऱ्यांच्या मागे उभे राहिले ते बडा कब्रस्थानचे चेअरमन शोहेब खतीब. अनेकांसाठी तर त्यांनी कब्रस्थानची जागाच उपलब्ध करून दिली. हिंदूंचा अंतिम संस्कार करताना आपला धर्म बाटतो असा विचार सुद्धा त्यांना शिवला नाही. फक्त हिंदूंचीच नाही तर काही पारशी आणि ख्रिस्ती बांधवांच्या प्रेतांचीही त्यांनी त्यांच्या त्यांच्या धर्म संस्कारानुसार विल्हेवाट लावली. पारशी बांधवांचे रीतिरिवाज वेगळे. ख्रिस्ती बांधवांचे रीतिरिवाज वेगळे. पण सगळेच सोपस्कार त्यांच्या त्यांच्या धर्माप्रमाणे खतीब आणि ममदानी यांच्या टीमने पार पाडले.

इक्बाल ममदानी सांगत होते, आम्ही मुस्लिम प्रेतांची विल्हेवाट लावत होतो. त्यांचा विधीवत दफनविधी करत होतो. तेव्हा लक्षात आलं शवागरात अनेक प्रेतं पडून आहेत. आम्ही डॉक्टरांना विचारलं. तर ते म्हणाले, ही हिंदूंची प्रेतं आहेत. कुणीच घ्यायला यायला तयार नाही. महापालिकेचा स्टाफही आता कमी पडतोय. 

ममदानींनी त्यांना विचारलं, आम्ही हे केलं तर चालेल का? आम्ही त्यांच्या पद्धतीने करू. डॉक्टर म्हणाले, याहून काय चांगली गोष्ट आहे. फक्त रितसर परवानग्या काढू. मग तुम्ही हे करा. 

त्या सगळ्या परवानग्या मिळाल्या नंतर एप्रिल, मे, जून आणि आता जुलै चार महिने अव्याहतपणे ही टीम काम करतेय. या टीममध्ये आहेत दोनशे तरुण. पण ज्यांनी सुरवात केली त्या पहिल्या सात जणांची नावं मला तर आवर्जून सांगितलीच पाहिजेत. बडा कब्रस्थानचे चेअरमन शोहेब खतीब, वरिष्ठ पत्रकार इक्बाल ममदानी, उद्योजक शाबीर निर्बन, अ‍ॅड. इरफान शेख, उद्योजक सलीम पारेख, उद्योजक सोहेल शेख, सामाजिक कार्यकर्ते रफिक सुरतीया. आजतागायत हे लोक त्याच कामात आहेत. सुरवातीला अडचण आली Ambulance ची, शववहिनीची. कोविडग्रस्तांसाठी नातेवाईक येत नाही तर Ambulance कुठून मिळणार. ममदानी आणि खतीब यांनी मग नादुरुस्त, पडून राहिलेल्या Ambulance शोधून काढल्या. त्या दुरुस्त केल्या. आता त्या अखंडपणे काम करताहेत. या कामासाठी बडा कब्रस्थान खतीब भाई, इक्बाल भाई आणि त्यांची सगळी टीम एक रुपया घेत नाहीत. सगळा खर्च ते स्वतः उभा करतात. काही दानशूरांनी त्यांना मदत केली आहे. पण नातेवाईकांकडून ते एक पैसा घेत नाहीत. लॉकडाऊनमुळे लोक आधीच आर्थिक संकटात आहेत. शेवटचा संस्कार करायला त्यांच्याकडे कसे पैसे मागायचे? असा इक्बाल भाईंचा सवाल आहे.

इक्बाल भाई, त्यांचे सहकारी आणि या कामात जोडले गेलेले 200 मुस्लिम तरुण आपल्या कुटुंबाची पर्वा न करता काम करत आहेत. त्यांची गळाभेट घ्यावी, असं तुम्हालाही नक्कीच वाटत असेल. 

देशात द्वेषाचा विखार पसरवणारे, हिंदू - मुसलमान हिंदू - मुसलमान करणारे, Whatsapp वरती घाणेरड्या भाषेत उद्धार करणारे, गोडसेवाद्यांची जमात काही कमी नाही. आपल्या डोळ्यावरची आंधळी पट्टी कधी ते काढतील का? द्वेषानं भरलेलं पित्त कधी ओकून बाहेर फेकतील का? मोकळ्या मनाने कधी ममदानी, खतीब आणि त्यांच्या सहकाऱ्यांची गळा भेट घेतील का? या प्रश्नाचं उत्तर होकारार्थी यावं ही भाबडी आशा असेल कदाचित. उम्मीद का सोडायची?

(लेखक महाराष्ट्र विधान परिषदेचे सदस्य, राष्ट्र सेवा दलाचे कार्यकारी विश्वस्त आणि लोक भारती पक्षाचे अध्यक्ष आहेत.)

Wednesday, 29 July 2020

This reverse roadmap will take the country backward

The new education policy declared by BJP-led central government will... 

1) Deprive poor and backward categories from English education

2) Increase the gap between the 'haves' and 'have nots'

3) Make it more costly for middle class and the poor to access education

4) Destroy the base of equality in education

5) Reduce number of teachers. Deprive subjects of their respective subject teachers

6) Constrict aided education

7) Destroy the diversity of languages

8) Bring in more options for those willing to spend for education and leave only option of becoming skilled labours to those who do not have adequate means

9) Kill creativity and diversity and will use the 90 crore people only as labourers in this era of globalisation

The very concept of equal and just education is being torn down by introducing this new education policy. Education is brought in the name of human resources development, but this new policy views the majority only as labourers. This is not a roadmap to take the country forward, instead it will take the nation backward.

- Kapil Patil, MLC
President, Lok Bharati

देशाला मागे नेणारा उलटा रोडमॅप

केंद्रातील भाजप सरकारने जाहीर केलेलं नवीन शिक्षण धोरण म्हणजे -

1) गरीब आणि बहुजनांना इंग्रजी शिक्षणापासून वंचित ठेवणारं.
2) आहे रे आणि नाही रे वर्गातील दरी रुंदावणारं.
3) खाजगी शिक्षण महाग करणारं. कनिष्ठ आणि मध्यम वर्गावर शिक्षणाचा आर्थिक बोजा वाढवणारं.
4) समान शिक्षणाचा पाया उखडून टाकणारं.
5) विषयांना शिक्षक (सब्जेक्ट टीचर) नाकारणारं. शिक्षक संख्या कमी करणारं.
6) अनुदानित शिक्षणाचा संकोच करणारं.
7) भाषा वैविध्यांना फाटा देणारं.
8) शिक्षणासाठी खर्च करण्याची क्षमता असणाऱ्यांना इतर बोर्ड यांचा पर्याय देणारं आणि ज्यांची ऐपत नाही त्यांना फक्त कुशल कामगार बनवण्यासाठी शिक्षण देणारं. 
9) सर्जनशीलता, विविधता यांना मारणारं आणि जागतिकीकरणात 90 कोटी जनतेला फक्त मजूर म्हणून वापरणारं.

समान आणि न्यायपूर्ण शिक्षणाच्या संकल्पनेलाच या नवीन शिक्षण धोरणाच्या माध्यमातून खो घातला गेला आहे. मनुष्यबळ नाव बदलून शिक्षण आलं पण बहुजनांना मनुष्यबळात फक्त मजूर म्हणून पाहण्याचा दृष्टीकोन ठेवणारं हे धोरण आहे. देशाला मागे नेणारा हा उलटा रोडमॅप आहे.

- आमदार कपिल पाटील, अध्यक्ष, लोक भारती

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New Education Policy :
This reverse roadmap will take the country backward


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Saturday, 18 July 2020

शिक्षण खात्याचं डोकं ठिकाणावर आहे का? - आमदार कपिल पाटील


प्रति, 
मा. ना. श्रीमती वर्षाताई गायकवाड
शालेय शिक्षणमंत्री, महाराष्ट्र राज्य.

महोदया,
दोन लाखांपेक्षा जास्त शिक्षक, शिक्षकेतर कर्मचाऱ्यांना जुन्या पेन्शन योजनेतून वगळण्यासाठी शालेय शिक्षण विभागाने 10 जुलै रोजी कोतवाली अधिसूचना जारी केलेली आहे. प्रथमतः याचा तीव्र शब्दात निषेध.

मागच्या शिक्षणमंत्र्यांचा अजेंडा पुढे रेटत जाणीवपूर्वक शिक्षकांना टार्गेट करण्याचा प्रयत्न आपल्याकडून वारंवार होत असेल, तर मला आपल्याला नम्रपणे सांगावं लागेल, की या आघाडी सरकारशी, शिक्षण खात्याशी आम्हाला दोन हात करावे लागतील.

10 जुलै 2020 रोजी जारी केलेल्या या अधिसूचनेमुळे 1 नोव्हेंबर 2005 पूर्वी नियुक्ती असलेले विना अनुदानावर काम करणारे, अंशतः  अनुदानावर काम करणारे लाखो शिक्षक शिक्षकेतर कर्मचारी यांना जुन्या पेन्शन योजनेमधून बाहेर काढण्याचा डाव आखला जात आहे, असा आमचा आरोप आहे. आजचा निर्णय 15 वर्षांपूर्वी पूर्वलक्षी प्रभावाने कसा काय लावता येऊ शकतो?

या अधिसूचनेमुळे अनुदानित शाळांची व्याख्या बदलण्यात येणार आहे. 100 टक्के अनुदान असणाऱ्या शाळांचा अनुदानीत शाळेच्या व्याख्येत समावेश होणार आहे. विना अनुदानित शाळा व अंशत अनुदानित शाळांना यातून वगळण्यात आलेले आहे. पंधरा वीस वर्षे विना अनुदानावर काम करून टप्पा अनुदानावर आलेल्या सर्व कर्मचाऱ्यांना, विनाअनुदानित वाढीव तुकड्यांवर काम करणाऱ्या कर्मचाऱ्यांना जुनी पेन्शन योजना मिळू नये अशी तरतूद करण्यात आली आहे. शासनाने अनुदान सूत्रांचे पालन न केल्याने आर्थिक बोजा पडत आहे असे कारण देऊन 15 ते 20 वर्षे काम करणारे शिक्षक  शिक्षकेतर पगारापासून वंचित आहेत. आणि आता पेन्शनही काढून घेत आहेत. हे निषेधार्ह आहे.

कृपया 10 जुलैची ही अन्यायकारक अधिसूचना तातडीने मागे घ्यावी, ही विनंती.

अन्यथा....
धन्यवाद!

आपला स्नेहांकित,

कपिल पाटील, विपस

दिनांक : 18 जुलै 2020

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अधिक माहितीसाठी
शिक्षक भारतीचे कार्याध्यक्ष सुभाष मोरे यांचा ब्लॉग
Tap to read - https://bit.ly/2OAq58L

Friday, 3 July 2020

फारुख शेख का अभिनन्दन!


हमारे मित्र, मुंबई के उद्योगपति, समाजवादी आंदोलन के कार्यकर्ता फारुख शेख का बिहार विधान परिषद में राष्ट्रीय जनता दल की तरफ से चयन हुआ। फारुख शेख शुरू से ही राष्ट्र सेवा दल और समाजवादी आंदोलन से जुड़े हुए हैं।

बिहार के शिवहर तालुका से 500 रु लेकर यह नवयुवक 20 वर्ष पूर्व मुंबई आया और वह आज बड़ा उद्योगपति बन गया। लेकिन समाज से और गरीबों से उनका नाता कभी नहीं टूटा। यह फारुख भाई की विशेषता रही है।

मुंबई और बिहार में CAA, NRC  विरोधी परिषद में अतुल देशमुख के साथ फारुख शेख का बड़ा योगदान रहा है। उनकी विशेषता यह है कि वे मंच पर नहीं आते बल्कि मंच खड़ा करने में ज्यादा रुचि रखते हैं। कन्हैयाकुमार की मुंबई और शिवहर (बिहार) में हुई सफल सभा के पीछे उनका ही हाथ था। आंदोलनों में कार्यकर्ताओं की मदद करने तथा गरीबों के साथ सदैव खड़े रहते हैं। 

कोरोना लॉक डाउन के दरम्यान सेवा दल की तरफ से प्रवासी मजदूरों के लिए सहायता राशि इकट्ठा करने का अभियान चलाया। उसमें सबसे बड़ा योगदान फारुख भाई ने दिया। उनके ही प्रयास से यह मदद कार्य पूरा हो सका। उनके ही कारण लगभग 1 लाख मजदूरों को अन्न किट पहुँचाने का श्रेय सेवा दल और छात्र भारती की टीम को मिला।

फारुख भाई इतने पर ही रुके नहीं बल्कि मजदूरों को अपने गाँव जाने के लिए ट्रेन, बस की व्यवस्था की। इन दिनों सोनू सूद की चर्चा सुर्खियों में रही और उनका सुर्खियों में होना स्वाभाविक भी रहा। लेकिन फारुख भाई ने इस तरह की कोई प्रसिद्धि नहीं लिया। यदि किसी से कहा जाय तो उसे आश्चर्य ही होगा कि फारुख भाई ने 9 ट्रेन मजदूरों के लिए छोड़ा। जब ट्रेन नहीं जा रही थी तो उन्होंने कई बसों के परिचालन की व्यवस्था की। लगभग 25 हजार प्रवासियों को उन्होंने बिहार भेजा।

फारुख भाई के इस काम पर बिहार में नीतीश कुमार, लालूप्रसाद यादव, शरद यादव ने ध्यान दिया और सम्मानित किया। विधान परिषद में जाने का मौका तेजस्वी यादव ने दिया।

फारुख शेख का अभिनन्दन!

- कपिल पाटील।

Wednesday, 17 June 2020

सिंहासन हलवणार दिगू टिपणीस


महाराष्ट्राच्या राजकारणावर अरुण साधूंची 'सिंहासन' कादंबरी खूप गाजली. जब्बार पटेलांनी त्यावर चित्रपटही काढला. त्यात दिगू टिपणीस नावाच्या पत्रकाराची व्यक्तिरेखा होती. राजकारणातले ते निर्दय डावपेच, उलथापालथी यांचा साक्षीदार होता दिगू टिपणीस. चित्रपटाची अखेर अस्वस्थ, वेडापिसा झालेल्या दिगू टिपणीसला दाखवून होते.

दिनू रणदिवे आणि जगन फडणीस या दोन पत्रकारांनी महाराष्ट्राची राजकीय पत्रकारिता चार दशके गाजवली. जगन फडणीस आजारपणातून आधीच निघून गेले. दिनू रणदिवे यांना 95 वर्षांचं आयुष्य लाभलं. पण दोघांची अखेर कफल्लक फकिरा सारखीच होती. दोघेही शेवटपर्यंत अस्वस्थ होते. दोघांच्याही जीवाची तगमग सुरू असायची. सामान्य माणसांशी, गरिबांशी, दुबळ्यांशी नाळ त्यांची जोडलेली होती. 
सिंहासन मधला तो दिगू टिपणीस दिनू रणदिवे आणि जगन फडणीस या दोघांचंच प्रतिबिंब होतं. 

दिनू रणदिवे, जगन फडणीस आणि सिंहासनकार अरुण साधू या तिघांच्या सोबत पत्रकारितेत काम करण्याची संधी मला मिळाली. तिघांकडून खूप शिकलो. तिघेही डाव्या विचारांचे. अरुण साधू मार्क्सवादी. दिनू रणदिवे आणि जगन फडणीस समाजवादी. तिघांच्याही जीवन निष्ठा शेवटच्या माणसाला वाहिलेल्या. 

अरुण साधू साहित्य संमेलनाचे अध्यक्षही झाले. तशी शैली जगन फडणीस आणि दिनू रणदिवे यांच्याकडे नव्हती. पण या दोघांची बातमीदारी अस्सल होती.  जगन फडणीसांचे 'महात्म्याची अखेर' हे पुस्तक प्रसिद्ध आहे. रणदिवेंचेही काही दीर्घ वृत्तांत एकत्र केले असते तर दोन, चार पुस्तकं सहज होऊ शकली असती. 

दिनू रणदिवे लोक विलक्षण माणूस. सत्ताधाऱ्यांना हलवण्याची ताकद त्यांच्यात होती. त्यांनी उघडकीस आणलेल्या सिमेंट प्रकरणात शेवटी तेव्हाच्या मुख्यमंत्र्यांनाही पायउतार व्हावं लागलं. बातमीचा माग काढताना ते पिच्छा सोडत नसत. सत्ताधाऱ्यांची पर्वा करत नसत. पण रणदिवेंनी एकदा बातमी दिली की त्याचा खुलासा परत करावा लागत नसे. 

रेल्वेच्या संपात ते दादर स्टेशनला दिवसभर उभे राहिले. किती ट्रेन जाताहेत हे मोजण्यासाठी. सगळं काही सुरळीत सुरू आहे, असं सांगणाऱ्या रेल्वे प्रशासनाचा रणदिवेंनी पर्दाफाश केला. 

रणदिवे मूळ आमच्या चिंचणीचे. पालघर जिल्ह्यातले. तिथल्या शेतकरी आणि आदिवासींशी असलेली नाळ त्यांनी पत्रकारितेतही जपली. राष्ट्र सेवा दल आणि डॉ. राममनोहर लोहियांमुळे त्यांच्या पत्रकारितेला एक समाजवादी दृष्टी होती.

एकदा त्यांना स्मशानभूमीत जावं लागलं होतं. आडोश्याला उभा असणारा एक खिन्न चेहरा त्यांनी पाहिला. रणदिवेंनी त्याला विचारलं, काय झालं? 

त्या माणसाचं मुल गेलं होतं. दफनाला जागा नव्हती. पावसाने पाणी साचलं होतं. त्या स्मशानभूमीत दफनासाठी पण स्वतंत्र जागा होती. रणदिवेंनी त्याला ती जागा दाखवली. 

तो म्हणाला, तिथे मला परवानगी मिळाली नाही. कारण ती हिंदू दफनभूमी आहे आणि मी दलित आहे. माझ्यासाठी जागा मिळाली नाही. म्हणून पाणी साचलेल्या जागीच लहानग्या मुलाला दफन करावं लागलं. पाणी साचलंय माझ्या मुलाला सर्दी होईल हो. म्हणून तो ओक्साबोक्शी रडायला लागला. 

त्याच्या उत्तराने रणदिवे हादरले. 'मुंबईतल्या हिंदु दफनभूमीत दलितांना जागा नाही.' ही बातमी दुसऱ्या दिवशी महाराष्ट्र टाइम्स मध्ये गाजली. विधिमंडळाचं अधिवेशन सुरू होतं. गजहब झाला. त्याच दिवशी संध्याकाळी शासनाने आदेश काढला, सर्व जातींना एकच स्मशानभूमी आणि दफनभूमी राहील. 

मुख्यमंत्री काय म्हणाले? आणि विरोधी पक्ष नेत्यांनी काय आरोप केला? नेत्याच्या मुलाने काय प्रताप केले? आणि दुसऱ्या युवराजाने मदतीचे फोटो कसे काढले? यावर सध्या वर्तमानपत्रांचे रकाने आणि माध्यमांचे बाईट्स भरलेले असतात. 

पण मुंबईतल्या स्मशानभूमीत जातीभेद चालतो, ही बातमी रणदिवेंच देऊ शकले. 

लॉकडाऊनमध्ये उद्ध्वस्त झालेल्या आणि हजार, दोन हजार किलोमीटर पायी चालत निघालेल्या स्थलांतरित कामगारांच्या रक्ताळलेल्या पायांची बातमी किती माध्यमं चालवतात?

अशा बातम्यांपासून माध्यमं व्यवस्थित Social Distancing  पाळत असतात. रणदिवेंच्या बातमीदारीत ना Social Distancing होतं ना Physical. 

संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलनाचा वारसा ज्या घरात आहे. त्या घरातले उद्धव ठाकरे आज मुख्यमंत्री आहेत. प्रबोधनकार ठाकरे, एस. एम. जोशी, भाई श्रीपाद अमृत डांगे, आचार्य अत्रे,शाहीर अमरशेख, सेनापती बापट यांच्या लढ्यातून संयुक्त महाराष्ट्र झाला. 105 हुतात्मे झाले. महाराष्ट्र जन्माला घातलेल्या या आंदोलनाचा जन्मच मुळी दिनू रणदिवेंमुळे झाला. पहिली ठिणगी त्यांनीच टाकली. शिवाजी पार्कच्या पहिल्या सभेचे आयोजक ते आणि प्रभाकर कुंटे होते. 

संयुक्त महाराष्ट्र पत्रिका हे साप्ताहिक रणदिवेंनी सुरू केलं होतं. पहिला अंक त्यांनी आणि त्यांच्या सहकाऱ्यांनी दादरच्या रस्त्यांवर ओरडत विकला आणि तासाभरात 2 हजार प्रति संपल्या.  पुढे 50 हजारावर खप गेला होता. गोवा मुक्ती आंदोलनातही रणदिवेंनी तुरुंगवास भोगला. 

संयुक्त महाराष्ट्र पत्रिकेसाठी रणदिवे सर्वप्रथम प्रबोधनकार ठाकरेंकडे गेले होते. तिथेच त्यांची बाळासाहेब ठाकरेंशी ओळख झाली आणि पत्रिकेच्या पहिल्या अंकापासून बाळासाहेबांची पहिली वहिली व्यंगचित्र प्रकाशित होऊ लागली. हे मैत्र्य त्या दोघांनी अखेरपर्यंत जपलं. दोघांचे अरेतुरेचे संबंध होते. 

दिनू रणदिवे नेता मानत ते राममनोहर लोहियांना आणि एस.  एम. जोशींना. पण आंदोलन संपल्यानंतर ते राजकारणात गेले नाहीत. पत्रकारीतेतच रमले. महाराष्ट्र टाइम्स सुरू झाला. रणदिवे अखेरपर्यंत तिथेच राहिले. चीफ रिपोर्टर म्हणून निवृत्त झाले. 

दिनू रणदिवे माझ्या गावचे. समाजवादी विचाराचे. सेवा दलाचे. त्यामुळे त्यांचं प्रेम खूप लाभलं. अलीकडच्या काळात त्यांची फारसी भेट होत नव्हती. पण काल अखेरचं दर्शन घ्यायला गेलो तेव्हा गलबलून गेलो. त्यांच्या पत्नी सविता रणदिवे यांचं महिन्यापूर्वीच निधन झालं होतं. त्यामुळे एकटे पडले होते. घरी करणारं कुणी नव्हतं. महाराष्ट्र टाइम्सचा हॅरीश शेख आणि दीपा कदम हे पत्रकार दांपत्य त्यांची अखेरच्या काळात सेवा करत होते. संजय व्हनमाने लालबागच्या राजाकडून त्यांना रोज डबा पाठवत होता. समर खडस सांगत होता हॅरीस आणि दीपाने खूप सेवा केली. लॉकडाऊनच्या काळात अशा माणसांचे हाल पाहवत नसतात. पण तरुण पत्रकार मित्र आस्थेने काम करतात याचंही कौतुक वाटतं.

काही दिवसांपूर्वी दिनू रणदिवे यांना गृहमंत्री अनिल देशमुख भेटायला आले होते. रणदिवेंनी त्यांना काय विचारलं असेल? 

लॉकडाऊनमुळे सामान्य माणसांचे हाल होताहेत. कधी संपेल हे?

महाराष्ट्राच्या पत्रकारितेचा दिनू रणदिवे मानदंड होते. मापदंड.

- कपिल पाटील