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Wednesday, 21 February 2018

हिंदी सहित सभी प्रादेशिक भाषाओं पर आयसीएसई बोर्ड का सितम

विधायक कपिल पाटील का प्रकाश जी जावडेकर को पत्र 

दिनांक : २१/०२/२०१८

प्रति,
माननीय श्री. प्रकाश जी जावडेकर
मानव संसाधन विकास मंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली

महोदय,
आज २१ फरवरी अंतर्राष्ट्रीय मातृ भाषा दिन है। पूरी दुनिया हर्षोल्लास के साथ अपनी मातृ भाषा का जश्न मना रही है। परंतु बडे खेद के साथ मैं यह पत्र आपको भेज रहा हूं। देश की राजभाषा हिंदी समेत हर प्रदेश की भाषा संकट में है। ICSE बोर्ड के स्कूलों में विदेशी भाषाओं के प्रभाव से हमारी मातृ भाषाओं को दूर रखने की पुरजोर कोशिश हो रही है

हिंदी केवल राजभाषा नही हमारी एक पहचान है। महात्मा गांधी के विचारो में हिंदी राष्ट्रगंगा है। भारत की हर भाषा इस देश की पहचान है। हर भाषा हमारी राष्ट्रभाषा है। यदि इस कथन का गहराई से विश्लेषण किया जाए तो कई तथ्य हमारे सामने आएंगे। किसी भी देश की भाषा उसकी संस्कृति से जुडी होती है। भारत के हर प्रदेश की भाषा को केवल प्रादेशिक भाषा के रुप में नही पहचाना जा सकता। हर प्रदेश की भाषा हमारी राष्ट्रभाषा है। हिंदी के साथ इन सभी भारतीय भाषाओं ने चाहे वह मराठी, उर्दू, गुजराती, तमिल, मल्यालम, तेलगू, कन्नड, कश्मीरी, पंजाबी, बांग्ला, आसामी, उडिया हो या ईशान्य भारत की कई भाषाएँ हो, इस देश की संस्कृति को समृद्ध किया है। भारत एक विशाल देश है। हर प्रदेश की भाषा जरूर अलग है। मगर इन्ही भारतीय भाषाओं से मिलकर इस देश की संस्कृति का गुलिस्ताँ खिला है। कहा जाता है कि यदि किसी देश की संस्कृति पर हमला करना है तो सबसे पहले उसकी भाषा छीन लेनी चाहिए। वर्तमान संकट कोई बाहर से नही, अंदर से है। संकट हिंदी पर है, और सभी प्रदेश की भारतीय भाषाओं पर है। हमला आयसीएसई बोर्ड ने किया है। आयसीएसई बोर्ड से संलग्न दो हजार से जादा स्कूल देश में है। वहाँ पढनेवाले छात्रों की संख्या लाखो में है। विदेशी भाषाओं का विकल्प दे कर आयसीएसई बोर्ड ने हिंदी तथा अन्य प्रदेश भाषाओं का अस्तित्व ही संकट में डाल दिया है।

हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में १४ सितम्बर सन १९४९ को स्वीकार किया गया। संविधान मे अनुच्छेद ३४३ से ३५१ तक हिंदी को राजभाषा के संबंध में व्यवस्था की गयी है। उसे अपनाने और उसे सम्मान देने की बात की गई है। इसे अहिंदीभाषी महापुरुषों ने आगे बढाया। इसके लिए चाहे महात्मा गांधी की बात की जाय, आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती की बात की जाय, राजगोपालाचार्य अथवा नेताजी सुभाषचंद्र बोस सहित अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की बात की जाय। सबने एक स्वर में हिंदी के महत्त्व को स्वीकर ही नहीं किया बल्कि इसके प्रचार-प्रसार में अपना जीवन खपा दिया। देश को स्वतंत्र कराने में हिंदी भाषा का कितना योगदान रहा है, यह किसी से छिपा नही है। उसी समय हिंदी ने सिद्ध किया था कि अगर भारतीयों को कोई भाषा एक सूत्र में बांध सकती है तो वह भाषा हिंदी ही है। 

वर्तमान सरकार कहती है की, हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए वह संकल्पबद्ध है। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद हिंदी में भाषण करते है। मगर केंद्र सरकार संचलित शैक्षणिक बोर्ड इस भाषा के पंख कतरने में कोई कोताही नहीं बरत रहे हैं। वर्तमान समय में अंतर्राष्ट्रीय बोर्डो सहित देश में कुल ५३ बोर्ड सक्रिय हैं। लगभग सभी बोर्डो ने त्रिभाषा सूत्र (फार्मूला ऑफ थ्री लैंग्वजेंस) को अपनाया है। सभी बोर्डो में हिंदी का शिक्षण कार्य अबाध गति से चल रहा है। किंतु यह बडे दुर्भाग्य की बात है कि भारत में संचालित होने वाला एक केंद्रीय बोर्ड जिसे आयसीएसई के नाम से जाना जाता है, उसने हिंदी समेत सभी प्रदेशिक भाषाओं की दुर्गति कर दी है। इन भाषाओं के समकक्ष कुछ विदेशी भाषाओं को विकल्प के तौर पर सामने ला दिया है। इसे समझने के लिए आयसीएसई बोर्ड में हिंदी की पूर्व स्थिति की पडताल जरुरी है।

हिंदी तथा प्रादेशिक भाषाओं की पूर्व स्थिति 
आयसीएसई बोर्ड में अंग्रेजी को प्रथम भाषा के रुप में रखा गया है जो अनिवार्य होती है। द्वितीय भाषा के रुप में हिंदी सहित देश की अन्य भाषाओंको एक साथ रखा गया। मतलब, यदि छात्र हिंदी की जगह संस्कृत, उर्दू, उडिया, मराठी, बांग्ला, कन्नड, तमिल इत्यादि किसी भी भारतीय भाषा का चयन करना चाहता है तो कर सकता है। ऐसा दशकों से चला आ रहा था। पाठ्यक्रम में फ्रेंच को भी रखा गया था लेकिन उस भाषा के चयन हेतु बोर्ड ने ग्रीन कार्ड सहित अन्य तमाम शर्तो को रखा था। उन शर्तो को पूरा करने के बाद ही छात्र हिंदी व अन्य प्रदेशिक भाषा के स्थान पर फ्रेंच भाषा ले सकता था। इस नीति के कारण हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं की संप्रभुता बरकरार थी।

बोर्ड में भारतीय भाषाओंकी वर्तमान स्थिति
बोर्ड की भाषा संबन्धी गलत व अव्यवहारिक नीतियों के कारण हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाएँ संकट में है। आयसीएसई बोर्ड ने हिंदी और प्रदेशिक भाषाओं के सामने फ्रेंच सहित कई दूसरी विदेशी भाषाओं को विकल्प के तौर पर पेश कर दिया है। इससे अभिभावक शौक वश अपने बच्चों के लिए विदेशी भाषाओं का चुनाव कर रहै हैं। इस प्रकार का क्षणिक आकर्षण देश की अस्मिता पर भारी पड रहा है। हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के साथ इस प्रकार का खिलवाड दुखद है। इसके लिए जितनी भी भर्त्सना की जाय, कम है। इस संदर्भ में सरकार को तुरंत संज्ञान लेना चाहिए। काैसिंल की भाषा संबन्धी इस नीति के कारण शिक्षकों के समक्ष जो रोजी-रोटी का प्रश्न पैदा हुआ सो अलग। 

भारतीय भाषाओं का सम्मान करे
हमें किसी भी विदेशी भाषा से कोई दुराव नही है किंतु यदि आयसीएसई बोर्ड अपने पाठ्यक्रम में विदेशी भाषाओं को पहले ग्रुप में हिंदी व अन्य प्रदेशिक भाषाओं का पर्याय न रखकर अपनी पहिली वाली पाठ्यक्रम की 'भाषा-नीति' बहाल करे या त्रिभाषा सूत्र नीति अपनाकर उसमें फ्रेंच व अन्य विदेशी भाषाओं को स्थान दे या फ्रेंच सहित अन्य विदेशी भाषाओंको मात्र तीसरे ग्रुप (एप्लीकेशंस विषय-ग्रुप) में रखे तो समस्या सुलझ जाएगी।  इससे भारतीय भाषाओंका सम्मान बढेगा और इच्छुक छात्र फ्रेंच सहित दूसरी विदेशी भाषाओं का चयन बिना किसी संकोच के कर सकेंगे।

आपका भवदीय,

कपिल पाटील
सदस्य, महाराष्ट्र विधान परिषद 
kapilhpatil@gmail.com

Saturday, 3 February 2018

लालूप्रसाद यादव के कारावास का मतलब

फासिस्ट राजनीति के विरुद्ध सामाजिक न्याय की लड़ाई


केंद्र की भाजपा सरकार का अपने विरोधियों से निपटने का एजेंडा एकदम साफ़ है। विरोध की आवाज उठाने वाले नेता अगर दूसरे धर्म के हैं तो उन्हें आतंकवादी घोषित दो। यदि वे दलित, आदिवासी हैं, तो उन्हें नक्सलवादी घोषित कर दो। बाक़ी लोगों को देशद्रोही घोषित कर दो।  इन तीन खांचे में जो राजनीतिक पार्टियां फिट नहीं बैठतीं, उन्हें भ्रष्टाचारी घोषित करने का विकल्प भी है। 

लालूप्रसाद यादव को दूसरी बार जेल में डालने के लिए इस चौथे विकल्प का ही भाजपा ने इस्तेमाल किया है। तथाकथित चारा घोटाले में बाक़ी सभी को क्लीनचिट मिल गई। जिनके कार्यकाल में यह कथित घोटाला शुरू हुआ, उन तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र को एक केस में क्लीनचिट दे दी गई। ता की बाहर रहने का रास्ता मिल जाए । लालूप्रसाद यादव को केवल चुनकर भ्रष्टाचारी ठहराया गया है। चारा घोटाले की चर्चा जब देश भर में हो रही थी, तब लालूप्रसाद के कट्टर विरोधी भी कहा करते थे, कि घोटाले करने वाले दूसरे हैं, और गिरफ्तार लालूप्रसाद को किया गया है। उनके ऊपर आरोप क्या है? यह कि इस घोटाले को उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए नज़रअंदाज़ कर दिया।

विरोधियों को चुन-चुनकर यदी वे पिछडा या दलित वर्ग के है, जानबूझकर बदनाम करना केंद्र की सत्ता में बैठे लोगों का एक सूत्री कार्यक्रम है। सीबीआई को इसके लिए इस्तेमाल करनेवाली बात अब किसी से छुपी नहीं है। जो घोटाला हुआ ही नहीं, उसके लिए 15 महीने न्यायिक हिरासत में गुजारने के बाद ए. राजा अब निर्दोष साबित होकर जेल से बाहर आए हैं। जब वह जेल में थे, तब वकीलों को देने के लिए भी पैसे नहीं थे। लेकिन 15 महीने बदनामी की कारावास झेली। उनका राजनीतिक करीयर ही खत्म हो गया।

भ्रष्टाचार, देशद्रोह, आंतकवाद के आरोपों से बरी करने के लिए भाजपा ने ही गंगाजल की व्यवस्था करके रखी है। मोदी या भाजपा की शरण में चले जाओ। जो लोग वास्तव में भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं, वे पानी सर पर से जाने से पहले ही भाजपा की एनडीए नौका पर सवार हो चुके हैं। जो लोग वास्तव में भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे थे, वे खूंटा तोड़कर भाजपा की नौका के पानी में जाने से पहले उस पर सवार हो चुके हैं। कुछ लोग राजनीतिक मजबूरी के लिए चलते मोदी की शरण में जा रहे हैं। कुछ लोग गंगाजल छिड़कवाकर शुद्ध होने के लिए सीधे भाजपा में प्रवेश कर रहे हैं। अनेक नेता इंतज़ार में बाड़ पर बैठे हैं, इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है? जगन्नाथ मिश्रा के चिरंजीवी ने जदयू के साथ मंत्री बनने के बाद सीधे भाजपा में छलांग लगा दी। नीतीश जगन्नाथ मिश्रा को मतदाताओं ने नकार दिया गया था, लेकिन पिताश्री की दिक्कते थोडी कम हो गई । शरण में जाने से इनकार करने वाले लालूप्रसाद को जेल भेज दिया गया। 

पूरे देश में मोदी सरकार के ख़िलाफ़ असंतोष फैला हुआ है। उसकी आग की लपटें मोदी के अपने राज्य गुजरात में ही भाजपा को लग चुकी हैं। एक युवा ने मोदी की सत्ता को चुनौती दी। उसके साथ कितना धोखा किया गया। हार्दिक पटेल की बदनाम करने के लिए भाजपा ने क्या नही किया। चुनाव के दौरान डॉक्टरर्ड सेक्स सीडी का प्रयोग भारतीय राजनीति के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ।

यह छल और धोखा कितना और कैसा? विश्वविद्यालय में हुए असंतोष पर देशद्रोह की मुहर लगा दी। कन्हैया और उमर ख़ालिद को राष्ट्रविरोधी साबित करने के लिए, जिन्होंने कभी स्वतंत्रता दिवस पर भी तिरंगा नहीं फहराया, वे तिरंगे को हाथ में लेकर देशभक्ति की नसीहत दे रहे हैं। जिसका भाई देश के लिए शहीद हो चुका है और जिसके घर के 16 लोग सेना में हैं, उस कन्हैया को देशद्रोही साबित करने के लिए टीवी चैनल पर संबित पात्रा कितना चिल्लाते नज़़र आते हैं।

दलित आंदोलन को दबाने के लिए रोहित वमूला की जाति तक खोज निकाली गई। भीम आर्मी के चंद्रशेखर जेल में क़ैद किया गया हैं। उन्होंने ऐसा क्या अपराध कर दिया है? अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालों को जेल को कोठरी में बंद किया जा रहा है।

सीमा पर देश की रक्षा करने वाले सरताज के पिता, मोहम्मद अखलाक़ को बीफ़ रखने की अफ़वाह फैलाकर मार डाला गया।

उत्तर प्रदेश में जब छात्राओं ने आवाज़ उठाना शुरू किया तो कुलपति कपड़ों और उनके और देर रात आने पर ही सवाल करने लगे। मुख्यमंत्री ने मोराल पुलिसिंग शुरू कर दी। 

विश्वविद्यालय के आंदोलन को कुचलने के लिए महाराष्ट्र में 'कानूनी' रास्ता अपनाया गया है। यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स काउंसिल के छात्र राजनीतिक आंदोलन में भाग नहीं ले सके, इसके लिए महाराष्ट्र विधान सभा में एक विधेयक को मंजूरी दी गई है। (विधान परिषद में हम विपक्षी दलों ने इसका विरोध करके फ़िलहाल उस पर रोक लगा रखी है।)

सामाजिक न्याय कि बुलंद आवाज बने है शरद यादव। शरण जाने से इन्कार करते है।  उन्हे संसद से हटाने के लिए असंविधानिक तरीक़े का इस्तेमाल किया गया।  

देश में अघोषित आपात है। सत्ता की अदृश्य शक्ति लोकतंत्र का गला घोंट रही है। जो कुछ चल रहा है, वह भयानक है। देश की वैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए किया जा रहा है, लालूप्रसाद यादव की क़ैद को इस बात की मिसाल है। इस पर चर्चा करने की आवश्यकता है। भाजपा ने पहले लालूप्रसाद यादव के हाथ से सत्ता हथिया ली और फिर उन्हें भ्रष्टाचार के कथित अपराधों के तहत बिरसा मुंडा जेल भेज दिया। लालूप्रसाद पर लगे आरोप पर क़ानून वैधानिक रूप से अपना काम करता तो बात अलग थी, जब क़ानून के हाथ को भी राजनीतिक शिकंजे में कस दिया जाता है, तब सवाल उठना लाज़मी है। सही मायने में लालूप्रसाद का अपराध क्या है? जब उन्होने आडवाणी का रथ रोक दिया था, तब से भाजपा उन पर कुपित है। तमाम कोशिशें कर लीं, लेकिन लालूप्रसाद उनकी शरण में जाने के लिए तैयार नहीं हुए। दूर-दराज़ के इलाक़ों में आवारा घूमने वाले बच्चों के लिए लालूप्रसाद ने चरवाहा विद्यालय खोला था। उन्हें ही एक चारा घोटाले में गिरफ़्तार कर लिया गया। आरोप लगाने के लिए उनके बच्चे तब बहुत छोटे थे लिहाज़ा, आज तेजस्वी यादव और मीसा भारती को फंसाया जा रहा है।  छल किया जा रहा है। बिहार में लालूप्रसाद यादव की सामाजिक न्याय की रणनीति ने धर्मद्वेष की राजनीति को कई बार पराजित किया है।  मोदी और भाजपा को इसी बात का ग़ुस्सा है। अब राजनीति मंच पर पार नहीं पा सके तो भ्रष्टाचार और कारावास का खेल खेल रहे हैं। 

यह समय ऐसा है जब अपनी भूमिका निभाने की आवश्यकता है, लालूप्रसाद यादव को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। शरद यादव जैसा बेदाग़ नेता लालूप्रसाद यादव के साथ आज दृढ़तापूर्वक खड़ा है। राजनीतिक लोकतंत्र सामाजिक लोकतंत्र के बिना सफल नहीं हो सकता है। इस बात का संकेत बाबासाहब डॉ. भीमराव अंबेडकर संविधान प्रस्तुत करते समय ही दे चुके हैं। आपातकाल के विरोध में सांसद पद छोड़ने वाले शरद यादव, सामाजिक न्याय की लड़ाई में भी उतनी ही मज़बूती से खड़े हैं, मंडल आयोग के फ़ैसले के समय देश यह देख भी चुका है। भारतीय राजनीति में सामाजिक अंतर्विरोध की समझ रखने वाले शरद यादव का लालूप्रसाद और तेजस्वी यादव के साथ खड़े होना स्वाभाविक है। हालांकि, भाजपा के विरोधी अब भी प्रतिक्रियाएं देने में झिझक रहे हैं, लेकिन उन्हें खुलकर आगे आना होगा। मोदी के मंत्रिमंडल में मंत्री अनंतकुमार हेगडे स्प्ष्टरूप से संविधान बदलने की भाषा बोल रहे हैं। हरियाणा और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री द्वेष फैलाने वाली भाषा बोल रहे हैं। बम विस्फोट में मासूम बच्चों की बलि देने वाले कर्नल पुरोहित और प्रज्ञा ठाकुर को मोक्का क़ानून से मुक्त कर दिया गया है। जल्द ही उन्हें देशभक्त घोषित कर दिया जाएगा।  

अगर फासिस्ट राजनीति के ख़िलाफ़ सामाजिक न्याय की लड़ाई शुरू नहीं की गई, तो लोकतंत्र ख़तरे में पड़ जाएगा।

- कपिल पाटिल
(लेखक महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य तथा जनता दल युनायडेट के महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष हैं)
kapilhpatil@gmail.com 

Wednesday, 19 July 2017

कांग्रेस को गांधी, आंबेडकर से एलर्जी क्यों?

नीतीश कुमार ने कोविंद को समर्थन क्यों दिया?




राष्ट्रपति पद के लिए सर्वमान्य उम्मीदवार का नाम तय करने के लिए संसद भवन में 22 जून को विपक्षी दलों की हुई अहम बैठक में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता कॉमरेड सीताराम येचुरी ने प्रकाश आंबेडकर का नाम सुझाया था। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद के रूप में दलित उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर देने से विपक्ष के लिए भी दलित प्रत्याशी उतारना अपरिहार्य हो गया था। सोनिया गांधी की सूचना के अनुसार शरद पवार की ओर से तीन नामों का प्रस्ताव आया था। इन तीन नामों में प्रकाश आंबेडकर का नाम शामिल नहीं किया गया था। मीरा कुमार, सुशील कुमार शिंदे और भालचंद्र मुणगेकर के रूप में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए तीन नाम प्रस्तावित थे। हालांकि प्रकाश आंबेडकर का नाम तीनों की अपेक्षा ज़्यादा वज़नदार था। इन तीनों प्रस्तावित नामों की तुलना में प्रकाश आंबेडकर उम्र में सबसे छोटे हैं, क्या इसी कारण उनकी उम्मीदवारी की अनदेखी कर दी गई? तो इसका जवाब है ‘नहीं। कांग्रेस के “शीर्ष नेताओं” ने इस बात की पूरी कोशिश की कि प्रकाश आंबेडकर का नाम चर्चा में ही न आने पाए।

सोनिया गांधी और राहुल गांधी बेशक कांग्रेस के सर्वोच्च नेता हैं। परंतु निर्णय लेने का अधिकार हमेशा कांग्रेस के “शीर्ष नेताओं” के पास ही रहा है। इन “शीर्ष नेताओं” को आंबेडकर नाम से ही एलर्जी है। कांग्रेस भले ही गांधी-नेहरू और नेहरू-गांधी की पार्टी मानी जाती हो, लेकिन कांग्रेस के इन “शीर्ष नेताओं” की मंडली ने पार्टी में नरम हिंदुत्व की परिपाटी को हमेशा सशक्त बनाए रखा। देश को सर्वोत्तम संविधान देने के लिए डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को आमंत्रण देने वाली कांग्रेस ने हिंदू कोड बिल के विद्रोह के बाद डॉ आंबेडकर को दो बार पराजित किया। महात्मा गांधी के पौत्र डॉ. गोपाल कृष्ण देवदास गांधी ने यह उल्लेख किया है कि संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद को देश का पहला राष्ट्रपति बनने का गौरव हासिल हुआ, लेकिन संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष डॉ. आंबेडकर को उपराष्ट्रपति बनाने का सुंदर अवसर कांग्रेस ने ख़ुद ही गंवा दिया। आंबेडकर की उपेक्षा करने वाले कांग्रेस के नरम हिंदूवादी नेताओं ने आख़िरकार डॉ. सर्वपल्ली राधाकृषणन को उपराष्ट्रपति बना दिया।

डॉ. आंबेडकर का संघर्ष हिंदू धर्म में ब्राम्हणवाद के विरोध में था। न कि ब्राह्मणों के विरोध में। बल्कि डॉ. आंबडेकर ने ब्राह्मणों का साथ लेने के लिए महाड समता संघर्ष के जेधे, जवलकर जैसे गैर-ब्राह्मणों का भी विरोध किया। ब्राम्हण सहस्त्रबुद्धे के हाथों से मनुस्मृति की होली जलाई थी। उस संघर्ष में चिटणीस, टिपणीस, चित्रे जैसे कायस्थों ने भी बाबासाहेब का साथ दिया था। महाराष्ट्र के अनेक ब्राह्मण भी इस संघर्ष में आंबेडकर के साथ डटकर खड़े रहे। परंतु कांग्रेस के ब्राह्मणों ने भी हिंदू कोड बिल का ज़ोरदार विरोध किया और कायस्थ डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी इन विरोधियों का साथ दिया, इसी कारण नेहरू को अपने क़दम पीछे लेने पड़े। उसी परंपरा का निर्वहन प्रकाश आंबेडकर के नाम के साथ किया गया हो, तो इसमें हैरानी की क्या बात है? क्या कांग्रेस ने डॉ आंबेडकर का स्मारक बनाने के लिए कभी खुद पहल की? आखिर स्मारक के लिए इंदु मिल की ज़मीन देने में इतनी देरी क्यों हुई? डॉ आंबेडकर को भारत रत्न देने के लिए जनता दल और विश्वनाथ प्रताप सिंह को सत्ता में आना पड़ा। धर्मांतरित दलितों को छूट देने के प्रसिडेंशियल ऑर्डर पर पहले राष्ट्रपति ने रोक लगा दी थी। वीपी सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद इनमें से सिर्फ़ बौद्धों को छूट मिलने लगी। कांग्रेस पार्टी ने जिस मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को बहुत लंबे समय तक ठंडे बस्ते में डाल कर रखा था, उस मंडल आयोग की सिफारिशों को भी वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद लागू किया।

आख़िरकार राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस ने प्रकाश आंबेडकर या फिर भालचंद मुणगेकर के नाम पर विचार क्यों नहीं किया? मीरा कुमार किसी भी दृष्टि से आंबेडकरवादी नहीं हैं। कांग्रेस के ‘शीर्ष’ नेताओं ने आंबेडकर का विकल्प जिस जगजीवन राम को माना था, मीरा कुमार उसी परंपरा की प्रतिनिधि हैं। इतना ही नहीं, सोनिया गांधी ने बाबासाहेब का नाम जितनी बार लिया होगा, उतनी बार मीरा कुमार ने कभी लिया होगा क्या? एक भी बार नही। रामनाथ कोविंद का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कभी भी कोई संबंध नहीं रहा। वह मोरारजी देसाई के सचिव थे। 1990 में वह भाजपा के संपर्क में आए। दरअसल, उस समय भाजपा को सोशल इंजीनियरिंग की सख़्त जरूरत थी। कोविंद राज्यसभा में सार्वजनिक तौर पर ख़ुद को बाबासाहेब का ऋणी स्वीकार कर चुके हैं। लेकिन मीरा कुमार का क्या? एक बार भी उन्होंने बाबासाहेब का आभार नहीं माना।

कांग्रेस के ये “शीर्ष नेता” अब नीतीश कुमार पर विपक्ष को कमज़ोर करने का आरोप लगाकर उन्हें कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि सच यह है कि सबसे पहले नीतीश कुमार ने पहल की थी कि सभी विपक्षी दलों को राष्ट्रपति पद के लिए सर्वसम्मति से उम्मीदवार तय करना चाहिए, नरेंद्र मोदी और भाजपा का पुरजोर विरोध करने के लिए राष्ट्रपति चुनाव में तगड़ा उम्मीदवार खड़ा करने का विपक्ष के पास सुनहरा अवसर है और हमें इसमें जीत भी हासिल हो सकती है। इसी विश्वास और दृढ़निश्चय के साथ नीतीश सबसे पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिले थे। उन्होंने कॉमरेड सीताराम येचुरी समेत कई प्रमुख नेताओं से भी मुलाकात की थी। मुलाकात के दौरान कई नाम की चर्चा हुई। गोपाल कृष्ण गांधी के नाम पर सहमति भी बन गई थी। गोपाल कृष्ण गांधी एक ऐसा नाम है जो समूचे विपक्ष को एकजुट करता है। भाजपा के समक्ष कड़ी चुनौती खड़ी की जा सकती है। और विपक्ष के विजय का आग़ाज़ किया जा सकता है। इसी विश्वास और दृढ़संकल्प के साथ नीतीश कुमार ने गोपाल कृष्ण गांधी के लिए समर्थन मांगा था। सीताराम येचुरी और उनके मार्क्सवादी कम्युनिस्ट नेताओं ने खुले तौर पर और मन से गोपाल कृष्ण गांधी के नाम पर सहमति जताई थी। लेकिन कांग्रेस ने आख़िर तक उसे अधर में लटका कर रखा। आख़िरकार गोपाल कृष्ण गांधी के नाम में क्या कमी थी? वह पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल हैं, अशोक विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष हैं, सेवानिवृत्त नौकरशाह एवं डिप्लोमेट रहे हैं, वह दक्षिण अफ्रीका में भारत के राजदूत रह चुके हैं, वह विश्व विख्यात विद्वान और गांधी-आंबेडकर के विचारों के पैरोकार हैं, लेकिन कांग्रेस को उनके नाम से ही एलर्जी है। कारण यह है कि वह महात्मा गांधी के प्रपौत्र हैं।

कांग्रेस में “शीर्ष नेताओं को” गांधी-नेहरू कि नही नेहरू-गांधी की विरासत स्वीकार है। लेकिन नेहरू (इंदिरा) गांधी की इस परंपरा के लिए गोपाल कृष्ण गांधी बाधा हैं। विभाजन के विरोध में महात्मा गांधी हठपूर्वक अड़े रहे। तब कांग्रेस नेतृत्व के लिए गांधी भी समस्या लगने लगे थे। संविधान सभा में डॉ आंबेडकर का चयन कांग्रेस ने नहीं होने दिया। उन्हें बंगाल से आना पड़ा। इस बारे में महात्माजी ने सार्वजनिक तौर पर बयान भी दिया था। (3 फरवरी 1947) विभाजन के कारण बंगाल से मिली सदस्यता छिन जाने के कारण गांधी-नेहरू-पटेल के हस्तक्षेप से मुंबई एसेंबली ने बाबासाहेब का चयन किया था। यह बात सच है। परंतु संविधान देने के बाद भी कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने 1952 और 1954 के चुनाव में आंबेडकर को हराने की हर संभव कोशिश की। 1952 के चुनाव में कम्युनिस्टों ने मतदान में गड़बड़ी की थी। इस ग़लती को सुधारने के लिए मार्क्सवादी कम्युनिस्टों ने गोपाल कृष्ण गांधी को राज्यपाल के तौर पर पश्चिम बंगाल बुलाने का फ़ैसला किया। गोपाल कृष्ण गांधी को राष्ट्रपती बनाने की पैरवी सीताराम येचुरी ने काफ़ी मुखर होकर की थी।

चेन्नई में 3 जून को करुणानिधि के सम्मान के अवसर पर जुटे सभी विपक्षी दलों के नेताओं ने एक अनौपचारिक बैठक में गोपाल कृष्ण गांधी के नाम को सर्वसम्मति से मंजूर कर लिया था। नीतीश कुमार ने कॉमरेड सीताराम येचुरी से कहा था कि गोपाल कृष्ण गांधी के नाम की घोषणा पहले कर दें, भाजपा को अवसर न दें। इस बारे मे कांग्रेस से भी बातचीत कर लें। लेकिन हुआ इसके एकदम विपरीत। कांग्रेस ने नीतीश कुमार की बात को कोई तवज्जो ही नहीं दी। इस दौरान नरेंद्र मोदी ने विपक्ष पक्षों से वार्ता करने के लिए जेटली-नायडू की कमेटी गठित कर दी। कांग्रेस ने विपक्षी दलों की सहमति से प्रस्तावित नाम को समर्थन देने की बजाय भाजपा से ही अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा करने का आग्रह किया। यह अप्रत्याशित एवं अविश्वसनीय क़दम था। मोदी-शाह ने इस अवसर का फायदा उठाया। रतन टाटा से लेकर अमिताभ बच्चन तक तमाम नामों को दरकिनार करते हुए अमित शाह ने रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा कर दी। रतन टाटा नागपुर के रेशम बाग जाकर सरसंघचालकों से मिलकर भी आए थे। इसका मतलब विपक्ष किसी ग़लतफ़हमी में था, यह बोलने से बेहतर यह कहना सही होगा कि कांग्रेस ने एक बहुत ही बेहतरीन अवसर को हाथ से जाने दिया। कांग्रेस ने एक तरह से सभी विपक्षी दलों को भाजपा की जाल (ट्रॅप में) में ढकेल दिया।

नेहरू परिवार के सभी नामों से देश के लोग भली-भांति परिचित हैं। गांधी जी के बच्चों, उनके नाती-पोते कहां हैं, यह देशवासियों को शायद ही पता होगा। गोपाल कृष्ण, राज मोहन, अरुण, इला गांधी जैसे लोगों ने कभी भी गांधी नाम का फायदा नहीं उठाया। ये लोग अपने अपने क्षेत्र में अपनी ज़िम्मेदारियों का वहन करते रहे। गांधी के तीनों प्रपौत्रों के दिल में आज भी गांधी हैं और उनका आंबेडकर के विचारों के प्रति गहरी आस्था और झुकाव है। गांधीजी की परपोती इला गांधी दक्षिण अफ्रीका में नेलसन मंडेला की सहयोगी रही हैं। वह उनके साथ जेल भी गई थीं। डरबन के गांधी आश्रम को जला दिया गया। तब रंगभेद के शिकार हुए जुलु समुदाय का क्या कसूर था? इन शब्दों में आफ्रिकन भारतीयों को गांधी के प्रपौत्र अरुण गांधी ने कडे शब्दों में खरीखुरी सुनाई थी। गोपाल कृष्ण गांधी कांग्रेस की इन्हीं नीतियों के ख़िलाफ़ अपने लेखों के माध्यम से आवाज़ उठाते रहे हैं।

'Exploitation of the charisma of the great dead is not the monopoly of one party alone, it is a national political pastime. Dr Ambedkar’s name has become a kamadhenu which all manner of self-promoters seek to milk.' (Apr 17, 2015, scroll. in)

कांग्रेस को आंबेडकर या गांधी की जरूरत क्यों हैं? इस सवाल का इससे स्पष्ट जवाब और क्या हो सकता है। इतनी तीखी टिप्पणी कांग्रेस के “शीर्ष नेताओं” को कैसे हजम होगी? आंबेडकर की पराजय की टीस यशवंतराव चव्हाण के मन में भी थी। इसीलिए महाराष्ट्र में उन्होंने दादासाहेब गायकवाड़ के साथ समझौता किया था। फुले, साहू आंबेडकर से ही महाराष्ट्र की पहचान बनी है। कांग्रेस के “शीर्ष नेताओं” को आज भी यह मंजूर नहीं है।

दलितों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल के मुद्दे पर गांधी और आंबेडकर के बीच  को लेकर हुआ संघर्ष इतिहास है। इस संघर्ष पर बहुत ज्यादा ध्यान न देते हुए, गांधी और आंबेडकर में समन्वय बनाकर आगे बढ़ना होगा। गांधीजी के मन मे जो टीस थी, उससे प्रभावित हुए बिना गोपाल कृष्ण गांधी आंबेडकरवादी हो गए। इस बीच रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा होने के बाद वह विपक्षी दलों का उम्मीदवार बनने का प्रस्ताव विनम्रतापूर्वक नकार देते हैं।

नीतीश कुमार ने एक दिन इंतज़ार किया। जब कांग्रेस का दूत बनकर गुलाम नबी आज़ाद एक दिन पटना आए। तभी यह स्पष्ट हो गया था कि कांग्रेस गोपाल कृष्ण गांधी या प्रकाश आंबेडकर के नाम पर विचार करने के लिए भी राजी नहीं है। इन सबके बावजूद नीतीश कुमार 22 तारीख को दिल्ली की बैठक में जाने को तैयारी की थी। परंतु कांग्रेस के दूत ने उन्हें सूचना दी कि वह बैठक में शामिल ही न हों। ‘हम बाद में तय करके आपको सूचना दे देंगे’, आज़ाद के यह कहने के बाद नीतीश कुमार का दिल्ली जाने का प्रश्न ही नहीं उठता था।

जब मोदी ने कांग्रेसमुक्त भारत की घोषणा की थी, उस समय एकमात्र नीतीश कुमार ने संघमुक्त भारत की घोषणा करके मोदी को उत्तर देने का साहस दिखाया था। कांग्रेस को सरदार पटेल और सुभाष बाबू से ही एलर्जी है, ऐसा नहीं है। उसे गांधी-आंबेडकर से और ज़्यादा एलर्जी है। संघ, भाजपा और मोदी की राजनीति का विकल्प कांग्रेस केंद्रित राजनीति नहीं हो सकती। लेकिन विपक्षी दलों की केंद्र से मिलीभगत वाली राजनीति कांग्रेस कर रही है? यदि भाजपा से उनका गुप्त समझौता नहीं था, तो उन्होंने गोवा और मणिपुर को क्यों हाथ से जाने दिया। गोवा, मणिपुर के बाद राष्ट्रपति पद के चुनाव में विजय की संभावना क्या कांग्रेस ने जानबूझकर नहीं गंवाई।

नीतीश कुमार विचारों से पक्के लोहियावादी और आचरण से उतने ही गांधीवादी हैं। गोपाल कृष्ण गांधी के विनम्र इनकार को सही अर्थों में लेते हुए और कांग्रेस की राजनीति को धत्ता दिखाते हुए उन्होंने रामनाथ कोविंद के नाम को समर्थन दे दिया। पराजय के लिए मीरा कुमार या प्रकाश आंबेडकर की बलि देना नीतीश कुमार को मंजूर नहीं था। फिर  इसमें उन्होंने क्या गलत किया?

लोकसत्ता, 29 जून 2017 को प्रकाशित

कपिल पाटील
(लेखक महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य और महाराष्ट्र प्रदेश जनता दल युनाइटेड के अध्यक्ष हैं)
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